Friday, 15 May 2015

जज़्बात


जज़्बात .......

दिल को सुकून दे ऐसी बात कहाँ ,
जिए ख़ुशी से ऐसी किस्मत  कहाँ।
हम तो कोशिश कर कर हार चुकें ,
कोई  प्यार से हमे मनाये ऐसे हालत कहाँ।
जब भी पूछती खुद से कि क्या है पहेली?
खुशियाँ भुला दे ऐसी क्या है मज़बूरी ?
पलके बिछाये, आस लगाये सोचती हूँ मै ,
क्या है ऐसी तकलीफ जो भुला ना  पाती।
बस सोचती रहती कमी क्या थी मुझमे,
जो वो हुए न हमारे।
इंतज़ार करती हु उनके लौटने का ,
नज़रे ढूंढा  करती है उन्हें राहों में।
ये जानते हुए की वो नहीं आएंगे,
पर क्यूँ इस पागल दिल को समझाया करती हूँ।
बहुत पुकारा उन्हें दिल के गहराईयों से,
खो दिया खुद को उन्हें पाने की चाहत में.
मिला क्या मुझे दर्द के सिवा ,
जिसे प्यार किया उसने ही ठुकराया।
साथ चलना है हमे उसने कहा ता ,
पर राहे  अलग होंगी , ये कहा बताया था मुझे।
खेलता रहा वो मेरे जज्बातों से ,
और मै थमी सब लुटती रही।
ये कैसा हिसाब है वफ़ा का ,
यहाँ तो एक तरफ़ा इंसाफ है।
पूरी खुशिया उनके हिस्से में ,
तो मेरे हिस्से खुशिया पाने की सिर्फ प्यास है?