बारिशों के पानी से
सारी वादी भर गयी
न जाने क्यूँ दिल भर गया
न जाने क्यूँ आँख भर गयी...
कहाँ गएँ वो दिन कहा खो गयी वो गलियां जिस गलियों घूमते, फिरते, खेलते थे . आज
भी याद आते है वो खुबसूरत बचपन के पल . वो
सुहाने बरसात के दिन जब हम सुबह उठते थे और मम्मी से पूछते थे की मौसम कैसा है और
मम्मी बोलती थी की बारिश हो रही है . फिर हम झटपट उठकर
खिड़की से बहार झांकते और माँ से बोलते इतनी बारिश में स्कूल कैसे जायेंगे ? और माँ
बोलती जैसे सभी जाते है . और फिर फीका सा मन बना के स्कूल जाने की तैयारी करते . ऐसा नहीं था की बारिश पसंद नहीं थी बारिश तो पसंद इतनी थी पर
सिर्फ घुमने खेलने में स्कूल जाने में नहीं . पर माँ ने बोला तो स्कूल तो जाना ही
था . फिर ये सोचते की स्कूल तो जा राहे है पर बाकि के दोस्त आयंगे भी . फिर चुपके
पापा का फ़ोन उठा के दोस्तों को फ़ोन लगते ते की कोन कौन आ रहा है . जब ये पता चलता कि सभी आ राहे है तो मन इतना खुश की ख़ुशी का ठिकाना नहीं.
तैयार होकर स्कूल को निकलते छाता लेकर , बारिश को महसूस करते हुए . पुरे रस्ते ऊछल
–कूद मचाते हुए . जूते को पूरा पानी में भीगा कर स्कूल पहुचते. छतरी को क्लासरूम
के बहार खोल के रखते और फिर अन्दर जाते . सबसे पहले प्रेयर होती और फिर हम लोग
बैठते, बैठते ही हम सभी लोग की बाते शुरू
हो जाती बाते तो इतनी की जैसे सदियों से न मिले हो . फिर प्लान करते की शाम को कहा
मिलना है बारिश में कहा घूमना है. फिर सर कहते की अब बस करो बाते और बुक्स निकालो
. हम सभी लोग मन मार के बुक कॉपी निकल तो लेते पर पढने में मन किसका लगता . सरे
दिन खिड़की के बहार ही झांकते रहते और पहाड़ियों को निहारते रहते . पहाड़ो की हरियाली
देख कर मन तृप्त हो जाता . इतना खुबसूरत मौसम की मानो जन्नत हो. और बहार जाना एक
सपना .हम जहा रहते है वो पहाड़ी इलाका है सोनेभाद्र . बरसात के मौसम में चारो तरफ
हरियाली ही हरियाली छा जाती थी . अब क्या कर सकते थे स्कूल में आने के बाद सिर्फ शाम
को ही बहार घुमने को सोच सकते थे . जैसे तैसे स्कूल के घंटे बिताते थे . और छुट्टी
होने में कितना वक़्त और है गिनते थे . और छुट्टी
होने तक बारिश रुक न जाये मनाते रहते थे . जैसे ही बेल लगती पुरे क्लास में
ज़ोर से आवाज़ आती , हुर्रे ! छुट्टी होगई . हम सब लोग बहार निकलते और उछलते कूदते
भीगते घर को निकलते .बारिश की बूंदों से चेहरे को भिगोते और खुद भी भीग जाते.
घर पहुचते और माँ से बोलते खाना खाना
है और शाम को है घुमने जाना है माँ बोलती
की हां ठीक है पर जाओ कपडे बदलो वरना बीमार हो जाओगी . खाना खाते और शाम होते ही
घुमने निकल जाते मई मेरी दो सहेलिय सना और सपना . हम एक ही स्कूटी पे तीनो सवार
होकर घूमते . पुरे कॉलोनी क चक्कर कटते सुहाने मौसम का आनंद उठाते . रिमझिम बरसात से खुदको भिगाते और गाना गाते ..
रूकती है थमती है
कभी बरसती है
बदल पे पाँव रखे
बारिश मचलती है...आ..आ..आ.
रूकती है थमती है -2
ला ..ला..
छोटी सी कहानी से
बारिशों के पानी से .........नजाने क्यूँ आंख भर गयी ..
उस पल में ख़ुशी तो इतनी मिलती थी की मनो ज़िन्दगी यही है बस.
न आगे की फिक्र न कल बिछड़ने की ग़म . क्यूंकि सोचा ही नहीं था की हम कभी अलग होंगे
.हम सब बहुत मस्ती करते थे .
अब कहा है ऐसे दिन
अब हम सब अलग अलग जगह पर है . अब है साथ तो बस सुनहरी यादें . हम दूर भले ही होगये है पर हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा . हम आज भी
मिलके पुरानि ज़िन्दगी को जीने की कोशिश
करते है पर कभी हम तीनो में से एक साथ नहीं होता तो कभी ये मौसम . कभी वक़्त नहीं होता तो कभी वक़्त पे हम .

