थकन
एक भ्रह्म् सा था जो आज टुटा सा है,कोई अपना सा था जो आज छूटा सा है .
किसी को अपना मान कर जी रहे थे,
वो छलावा था आज पता चला है हमे.
हमने कोशिश बड़ी की थी संजोय रखने को उन्हें,
पर जैसे चाहत ही उनकी कोई और थी.
यकीन नहीं होता उनके अल्फाज़ो का,
उन्होंने कहा गलत या हमने सुना ही गलत.
कैसे समझ लू उनकी बातो को,
जब उन्होंने समझा ही नहीं हमारे जज़बातों को.
अब हर एक सचाई मन गढ़न कहानी लगती है,
अब कैसे जीये इस कहानी के सहारे.
हम खुशफहमी में जीते रहे पता नहीं क्यू,
आज दूर हुई गलतफैमी थी जो.
चाहते आज भी है हम की समझ जाये वो हमारी मजबूरिया,
पर समझाने की कोई वजह न रही.
आँखे नम है आज मेरी चेहरे पर उदासी है,
पर आंसू जिनके नाम का है वो आँखे बंद रखा है।
थक चुकी हूँ मै उन्हें समझा के उन्हें पुकार के
पर उन्होंने मेरी सुननी ही कब का छोड़ दी है।
