Monday, 17 April 2017

एहसास

खुद से लड़ती हु खुद से झगड़ती हूँ
खुद को मानाने में वक़्त गुज़रती हूँ।
समझा  भी लेती हु खुद को पर
फ़िरसे उन्ही में उलझ जाती हूँ।
दिल और दिमाग के चक्कर में फिर फंस जाती हूँ
कभी महसूस करू तो आँखों को धुंधला पाती  हूँ ।
आँखे साफ़ करू तो उम्मीदों को हरता पाती हूँ
उम्मीद के  सहारे एक नयी आस बनाती हूँ।
चीज़े वैसी तो नहीं जैसे हुआ करती थी
लोग वैसे नहीं जैसे हुआ करते थे।
पर ज़िद्द में अपने एक बात याद रखती हूँ।
प्यार से बाते हो ऐसी ख़ुशफ़हमी नई रखती हूँ।
हम तो समझ जायेंगे झूठ को तुम्हारे एक दिन
न समझे तो भी जीना तो सीख ही जायँगे एक दिन।
सोंचो खुद क्या पाओगे जब ठोकरे खाओगे,
लाख याद करोगे पर हमें पा न पाओगे।
खुद को कितना भी बर्बाद करोगे,
पर दिल तक दुबारा हमारे पहुच न पाओगे।
सोचोगे हर पल हमारे एहसास को,
पर एहसा-ए - बयाँ न कर पाओगे .
याद करोगे ,पर फरियाद हमतक पंहुचा न पाओगे.
सोंचों में हम, ख्यालों में हम ही हम होंगे.
यकीन है इस बात से  .
क्योंकि अगर जुड़े हम थे तुमसे
तो जुड़े कहीं न कहीं तो तुम भी होंगे हमसे ।

                                     by.. kusum (khushi)