Wednesday, 24 January 2018

टेक्नोलॉजी में कैद बचपन


कार्टून के किरदार हो या फिर मोबाइल गेम की गाड़ियां, रंग बिरंगे चित्र और उनकी अतरंगी हरकतें, ये सब हम सभी को पसंद हैं लेकिन देखने में जितनी दिलचस्प हैं ये सारी छीज़ें, असल में इनका परिणाम उतना ही भयंकर है। कुछ ऐसे ही परिणाम का शिकार हआ 8 साल का ऋषि। अपने माँ बाप की हर बात सुनता तो था लेकिन टीवी मोबाइल या वीडियो गेम्स मिलने की शर्त पर । जैसे कभी उसके मम्मी पापा ने उसको कहा कि, “बेटा दूध पी लो” तो वो कहता , “नहीं पीना”. “ठीक है तुम दूध नही पियोगे तो तुमको मोबाइल नही मिलेगा”। इसपर ऋषि कहता, “मैं दूध पी लूँगा लेकिन मुझे 15 मिनट गेम खेलने देना पड़ेगा अभी”.

माँ बेचारी क्या ही करती , बच्चे की तंदुरुस्ती का ख्याल रखते हुए उनको प्रॉमिस करना ही पड़ता। ऐसे अगर देखा जाए तो पूरे दिन में ऋषि के 3 4 घंटे मोबाइल या टीवी स्क्रेन के सामने बैठे ही बीत जाते थे।
ये सब ऋषि को इतना अच्छा लगता था कि बाहर पार्क में भी जाना छोड़ दिया उसने। पार्क में जाकर भागने-दौड़ने से तो उसको अपने घर के बिस्तर पर लेट कर मोबाइल फ़ोन पर गेम्स खेलना ज़्यादा अच्छा लगने लगा। सुबह दूध पीते-पीते टी.वी, स्कूल से लौटने के बाद टी. वी, फिर शाम को पढ़ने से पहले मोबाइल या वीडियो गेम, पढ़ाई करने के बाद मोबाइल गेम, फिर डिनर करते-करते टी.वी, रात को सोते वक्त फिर से मोबाइल यहीं बन गया था ऋषि का रोज़ का रूटीन।
एक दिन ऋषि स्कूल से रोते-रोते लौट। उसका टेस्ट था उस दिन। मम्मी ने उससे पूछा कि क्यों रो रहे हो? ऋषि ने मम्मी को बोला के वो कुछ लिख ही नहीं पाया है, क्योंकि उसको अपनी सीट से बोर्ड दिखाई ही नहीं दे रहा था।

पापा के ऑफिस से लौटते ही ऋषि की मम्मी ने उनको ये बात बताई फिर वो ऋषि को लेकर डॉक्टर के पास गए, और टी. वी स्क्रीन देखने की वजह से ऋषि की आंखे कमज़ोर होगई हैं। डॉक्टर्स ने ऋषि और उसके मम्मी पापा को समझाया की बच्चे अगर ज़्यादा टी. वी, मोबाइल या कम्प्यूटर स्क्रीन देखते हैं तो उनकी आँखों की रौशनी चली जाती है। बाहर खुली हवा में फिजिकल एक्टिविटी ना करने की वजह से उनका शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है।
अगले दिन से ऋषि मोहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ पार्क में खेलने जाने लगा, एक मोटा से चश्मा लगाकर। मोबाइल और कार्टून से तो वो ऐसे डरने लगा जैसे ये कोई राक्षस हो।