Wednesday, 4 March 2015

Meri Pehchaan......














ज़िन्दगी में कदम रखा बेटी बनकर,
निभाएं रिश्ते मैंने दिल से अपना मान कर, 
कसक उठी मन में तो एक ख्याल आया, 
कसूर क्या था मेरा जो मुझे बोझ बनाया। 
उम्मीद  न थी की  ऐसा भी होगा, 
मेरे ईमान और त्याग का कोई मोल न होगा। 
प्यार के नाम पे अपमान मिलेगा ,
कदम-कदम पर ठहराओ  मिलेगा। 
आइना जो देखती हूँ ,खुद से यह पूछती हूँ ,
है क्या? पहचान मेरी जो इन कोहरो में है ढकी.
काजल  से लिखने जो बैठी अपने वज़ूद की कहानी, 
तो ज़मीर से यह आवाज़ है आई. 
कोरा  कागज़ है जब ज़िन्दगी तेरी ,
करले लाख तू कोशिशे इन्हे सजाने की ,
रंगत  नहीं है लौटने वाली तेरे   इस हसीन चेहरे की। 
सुनते ही मंन  झल्लाया मेरा, 
ठोकर लगी तो एसास हुआ, 
कौन है अपना ? जब सबने है ठुकराया यहाँ। 
जब आए  थे अकेले और जाना हैं अकेले ,
तो क्यू  ढूँढना  किसी और का सहारा। 
जो हुए न हमारे वे होंगे क्या किसी और के 
आज़ाद होने  दे मुझे अब इन पंछियो  की तरह. 
देखने दे चेहरा मुझे भी तेरा ऐ ज़ालिम दुनिया, 
जब सभी को है यहाँ अधिकार एक समान , 
तो हमें भी है हक़ खुले आसमान में उड़ान भरने का. 


1 comment:

  1. बेटियों की मार्मिक पीड़ा काही आपने बहुत बधाई । लेकिन इस इतिहास को बदलीये । जब भी नारी शक्ति ने प्रयास किया है इतिहास गवाह है , इतिहास बदला है । आगे आइये बीड़ा उठाये आज को बदलने का ।

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