Sunday, 20 September 2015

.....बंदिशें .....

नहीं रहना मुझे पहरों में,
नहीं जीना मुझे बंदिशों में .
सांसे मेरी थमने लगी है, 
धड़कने मेरी रुकने लगी हैं.
नज़रे जिसे ढूंढा  करती है ,
वो राहतें कहीं गुम हो गयीं हैं .
खुशियाँ मेरी उदासी  बन गयी है ,
मुस्कान मेरी खो गयी है .
ढूंढू  कैसे अपनी हंसी को,
कदम कदम पे रुकावटें खडी  हैं .
ज़माने हो गए  जिए हमें ,
अब मौत को गले लगाने की तमन्ना जगी है.
ज़िन्दगी मुस्कुराके हर एक ज़ख्म दे जाती है,
अपनाने के सिवा कोए रास्ता नहीं छोडती है .
कौन चाहता है रोना,
पर खुशियाँ मिले ,ऐसी खुशनसीबी कहा है ,
ज़ंजीरो में हु कैद, आजाद करने वाला कौन है .
हांथों में लकीरें तो दे दिया रब ने ,
पर उन लकीरों को ज़िन्दगी से जोड़ना भूल गया वो..... 

No comments:

Post a Comment