नहीं रहना मुझे पहरों में,
नहीं जीना मुझे बंदिशों में .
सांसे मेरी थमने लगी है,
धड़कने मेरी रुकने लगी हैं.
नज़रे जिसे ढूंढा करती है ,
वो राहतें कहीं गुम हो गयीं हैं .
खुशियाँ मेरी उदासी बन गयी है ,
मुस्कान मेरी खो गयी है .
ढूंढू कैसे अपनी हंसी को,
कदम कदम पे रुकावटें खडी हैं .
ज़माने हो गए जिए हमें ,
अब मौत को गले लगाने की तमन्ना जगी है.
ज़िन्दगी मुस्कुराके हर एक ज़ख्म दे जाती है,
अपनाने के सिवा कोए रास्ता नहीं छोडती है .
कौन चाहता है रोना,
पर खुशियाँ मिले ,ऐसी खुशनसीबी कहा है ,
ज़ंजीरो में हु कैद, आजाद करने वाला कौन है .
हांथों में लकीरें तो दे दिया रब ने ,
पर उन लकीरों को ज़िन्दगी से जोड़ना भूल गया वो.....

No comments:
Post a Comment