Wednesday, 14 September 2016

इंतज़ार












कैसे गुजारु ये दिन ये रात,
कैसे संभालू अपने ये जज़्बात .
एक वो है जो समझते नहीं,
और एक वक़्त है जो रुकता नहीं.
कोशिश लाख मेरी हार जाती है,
फिर नयी कोशिश को पुकार जाती है .
वो समझे तो समझाऊ अपनी दास्ताँ,
वो सुने तो सुनाऊ अपने दिल की व्यथा.
कहते है खामोशियों की अपनी एक अलग जुबान होती है,
कोई सुनने आये तो बताऊ की क्या कुछ दबाएँ बैठी है.
एक एक पल को जोड़ कर ज़िन्दगी बनायीं है,
उस एक पल में उनकी तस्वीर सजायी है.
इंतज़ार में उनके उमरे गंवाई है,
चाहतो से भरी आस  लगायी है .
चांदनी रातों में तारों से अपनी दुनिया सजाई है,
उनके आने की सदायें हवाओं में सुनी है.
आईने के सामने सजे खुद को कई बार देखा है, 
फिर उसी आइने में खुद को टूटते हुए भी देखा है.  
अतीत के पन्नो में जीवन संजो कर रखा है,
पलट कर जीने को दुबारा मन आज भी करता है .


By.. kusum khushi



No comments:

Post a Comment